Sunday, 26 March 2023

मणी सारे वाटेवर ..

मणी  सारे वाटेवर ..

वीज लकाकते आहे,
दिसे सारे क्षणभर ..
सर बरसते आहे 
वाट भिजे वीतभर !

बीज अंकुरते आहे,
कोंब फुटे पळभर ..
वेळ सरकते आहे 
जरा थांब घडीभर !

नभ विव्हळते आहे,
आसू आवर आवर ..
लाट फेसाळते आहे 
उठे मनी ते काहूर !

धार पाझरते आहे,
थेंब साचे पानावर ..
दुःख साकळते आहे 
धुके तरी मनावर !

जाळे पसरते आहे,
वेडी आस वाऱ्यावर 
माळ विखुरते आहे,
मणी सारे वाटेवर .. मणी सारे वाटेवर ...

Monday, 13 March 2023

ऐ मुसाफिर ..

 इन मुस्कानों की खूबसूरती पर

फ़िदा न होना ऐ मुसाफिर ..

बेनकाब उन चेहरों के पीछे ,

टूटे वादे भी बहुत है.. बेनाम जख्म भी  !!


सेह सको तो सेह लेना उस बेवफाई को,

फिर मत कहना, हमने वाकिफ नहीं किया ..

तजुर्बा हम भी रखते है ,

फिर मत कहना उसने घायल कर दिया !

उस बेवफाई के आशिक़ , गुमराह मुसाफिर भी बहुत है.. खोखले जज़बाद भी !


उन मैखानो ने देखे है ऐसे बदनसीब ..

जिनको उन्ही राहों पर पाया गया था !

ठन्डे अंगारे भी बहुत है, .. जलते चाँद भी !!


इसीलिए कहते है,

मत जाओ उन राहों पर..

मोड़ लो अपना रास्ता,

क्युकी पीछे छूटे उन नज़रों पर,

सिरवटें भी बहुत है,.. दरारें भी !!

Thursday, 9 March 2023

अगर..

 


आसमान तो छूना ही था, 

पाव फिर भी ज़मीन पर जमाने ही थे

उड़ान भरने का मज़ा ले पाते

अगर थोड़ी हिम्मत दे दी होती.. 


एहसासों को काबू करना ही था, 

मुश्किलें भी पार कर ही लेते

खुद को आज़माने का मज़ा ले पाते

अगर चार कदम और साथ दी होती.. 


कामयाबी तो हासिल करनी ही थी

कोशिश भी पूरी करते रहे

सफर का मज़ा ले पाते

अगर थोड़ा भरोसा भी दिखा दिया होता.. 


Tuesday, 7 March 2023

सुनकर भी अन्सुना कर दिया ..

सुनकर भी अन्सुना कर दिया 

हासिल कर फिर अदा कर दिया ..

हररोज न जाने मैंने ,

किन जजबाड़ों पर पर्दा कर दिया !


उठा कर फिर रिहा 

मिला कर फिर जुदा कर दिया

हर पल न जाने मैंने 

किन उम्मीदों को अलविदा कर दिया ..


खोल कर फिर कैद कर दिया 

छेड़ कर फिर खामोश कर दिया ..

हर सिलसिले में न जाने मैंने 

किन रास्तों पर सरफ़रोश कर दिया..


महज एक पल में मैंने,

इतना कुछ शामिल कर लिया 

समझ ही न पाई की 

क्या खो दिया और क्या हासिल कर लिया!!

मत पूछो !

  मत पूछो !


मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!


अंजान राहों से गुजरने पर..

मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


दुनिया ने सिखा दी, दुनियादारी 

जब अपनों ने अपनाना छोड़ दिया..

मोड़ आने से पहले ही 

अनजाने में खुद को मोड़ लिया 


उन गलियों की चाह छोड़ दी ,

उन घटाओं ने आह तोड़ दी 

जब अपनों को मनाते मनाते ..

हम ही ने रूठना छोड़ दिया !!


मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!