Tuesday, 7 March 2023

मत पूछो !

  मत पूछो !


मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!


अंजान राहों से गुजरने पर..

मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


दुनिया ने सिखा दी, दुनियादारी 

जब अपनों ने अपनाना छोड़ दिया..

मोड़ आने से पहले ही 

अनजाने में खुद को मोड़ लिया 


उन गलियों की चाह छोड़ दी ,

उन घटाओं ने आह तोड़ दी 

जब अपनों को मनाते मनाते ..

हम ही ने रूठना छोड़ दिया !!


मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"

जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !


मत पूछो इन हवाओं से,

उनके बहने का आलम ..

तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!


8 comments:

  1. Kya baat!kya baat! Really wonderful poem dear.

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  2. Very nice poem dear Prajakta.

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  3. खुप सुंदर 👏

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  4. From rma. Mast ahe poem.👌👍

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  5. सुंदर

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  6. Aparna gadgil- khup surekh shabda

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  7. वा खूप छान 😊👌🏼

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  8. Khup surekh 👌👌

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