मत पूछो !
मत पूछो इन हवाओं से,
उनके बहने का आलम ..
तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!
अंजान राहों से गुजरने पर..
मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"
जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !
दुनिया ने सिखा दी, दुनियादारी
जब अपनों ने अपनाना छोड़ दिया..
मोड़ आने से पहले ही
अनजाने में खुद को मोड़ लिया
उन गलियों की चाह छोड़ दी ,
उन घटाओं ने आह तोड़ दी
जब अपनों को मनाते मनाते ..
हम ही ने रूठना छोड़ दिया !!
मत पूछो , अब "क्या लगता है डर ?"
जानकार भी अंजान जब अपने ही हो गए थे !
मत पूछो इन हवाओं से,
उनके बहने का आलम ..
तबाही तो भीतर के तूफानों से हुई थी !!
Kya baat!kya baat! Really wonderful poem dear.
ReplyDeleteVery nice poem dear Prajakta.
ReplyDeleteखुप सुंदर 👏
ReplyDeleteFrom rma. Mast ahe poem.👌👍
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteAparna gadgil- khup surekh shabda
ReplyDeleteवा खूप छान 😊👌🏼
ReplyDeleteKhup surekh 👌👌
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